इतिहास लेखक : राम दयाल वर्मा जी से समझिए कि भर और राजभर व पासी जाति क्या हैं ? इन्हें कैसे वर्गीकृत किया गया हैं ? भर और राजभर में अंतर -- इस विषय पर हम पहले ही प्रकाश डाल चुके हैं अगर नये अंतरों के साथ कुछ पुराने अंतरों पर दृष्टिपात पुनः पड़ जाये तो वह स्वाभाविक और स्पष्टता लाने का ही मात्र माध्यम माने, पुनरावृत्ति दोष है पर क्षम्य है साहित्यिक अवधारणा से यह भर और राजभर का अंतर विविध पुस्तकों के अनुशीलन के माध्यम से रख रहा हू , विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत ,आप लोग देखें - नस्ल भेद : भर लोग द्रविड़ यानी नाग नस्ल के मनुष्य का जातीय समूह हैं,इनकी मध्यम कद काठी है और अधिकतर श्यामल त्वचा वाला समूह है। राजभर : यह जाति आर्य नस्ल की जाति है, रंग साफ और कद लंबा तथा छरहरा होता है यह असल भेद दोनों भर और राजभर को नस्ल के हिसाब से प्रथक प्रथक निर्णीत करता है। दोनों एक नहीं है नस्ल के अनुसार और राज्यों की सूची के मुताबिक भी - गोत्र और उत्पत्ति : भर लोग भारशिव नागों के वंशज हैं और इनका गोत्र पंच करपटी है महाभरत के अन...
#क्रिमनल_ट्राइब_एक्ट (जरायम एक्ट पेसा कानून) क्या है अपराध सील जातिया| आज हम बात करेंगे कि अछूत दलित कौन है? और यह लोग दलित कैसे बन गए? इसकी शुरुआत होती है अंग्रेजों की एक साजिश से। जिसका नाम है, क्रिमिनल_ट्राइब्स_एक्ट 1871, यदि मैं कहूं ,आपकी पूरी जाति को 80 साल मतलब 3 पीढ़ियों के लिए सामाजिक ढांचे से अलग कर दिया जाए। आपको बहिस्कृत कर दिया जाए तो आपका क्या होगा? आप आज के दलित बन जाएंगे। अंग्रेजो ने यही किया । अंग्रेजों ने 1871 से 1952 तक 200 से अधिक जातियों के 4 करोङ से अधिक लोगों को अपराधी का ठप्पा लगा दिया। और उन्हें समाजिक ढांचे से विमुक्त कर दिया। ये कोई फिल्म की कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। ये उन्हीं जातियों के लोग है जो आज खुद को दलित कहते है। इन जातियों के पूरे समूह को अपराधी घोषित कर दिया गया। इन जातियों के लोग अंग्रेजी प्रशासन की आज्ञा के बिना अपने क्षेत्र से बाहर नही जा सकते थे इन्हें प्रशासन की नज़र में ही रहना पड़ता था। जिससे ये अन्य समाज से धीरे-धीरे अलग होते चले गए। 80 साल का वक़्त मतलब तीन पीढ़ी । जो किसी भी समाज की सभ्यता संस्क्रति औ...
प्रकथन इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि वह किसी भी समाज की जड़ों की पहचान होता है। जिस समाज के पास अपना गौरवशाली इतिहास नहीं होता, उसका भविष्य अक्सर दिशाहीन हो जाता है। पासी जाति का इतिहास उत्तर प्रदेश व बिहार के संघर्षशील अध्यायों से जुड़ा है, जिसे दुर्भाग्यवश मुख्यधारा के इतिहासकारों ने वह स्थान नहीं दिया जिसका वह हकदार था। इस पुस्तक को लिखने का विचार मेरे मन में तब आया जब मैंने अनुभव किया कि हमारी नई पीढ़ी अपनी गौरवशाली विरासत से अनभिज्ञ होती जा रही है। महाराजा बिजली पासी के किलों की दीवारों से लेकर, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगना ऊदा देवी के अदम्य साहस तक—पासी समाज का योगदान भारतीय मिट्टी के कण-कण में रचा-बसा है। यह समाज प्राचीन काल से ही रक्षक और योद्धा की भूमिका में रहा है। इस शोध यात्रा के दौरान मैंने पाया कि पासी समाज का इतिहास केवल युद्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कुशलता, सामाजिक एकता और अटूट स्वाभिमान की मिसाल है। अवध के मैदानों से लेकर बिहार की सीमाओं तक फैले इस समाज के राजाओं और सेनापतियों ने समय-समय पर अपनी वीरता से विदे...
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