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नमस्कार गूगल

नमस्कार गूगल मै रघुनाथ कुमार भारशिव पासी राजवंश ब्लॉग राइटर  मेरा ब्लॉग अनपब्लिक हो गया है जिस कारण मेरे दर्शको को पढ़ने में दिक्कत हो रही है कृपया मेरे ब्लॉग को पब्लिक किया जाय धन्यवाद

वीरांगना ऊदा देवी पासी जयंती #ऊदादेवी_जयंती

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हर साल की भांति इस साल भी 14 अप्रैल को वीरांगना ऊदादेवी पासी की जयंती सामाजिक संगठनों द्वारा इलाहाबाद ,प्रतापगढ़ ,उन्नाव, हरदोई,  फतेहपुर, लखनऊ, बरबंकी आदि जिलों में धूम धाम से मनाई गई  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, (इतिहास) वीरांगना उदा देवी पासी का जन्म 1829 पीलीभीत में पासी परिवार में हुआ था। जन्म तिथि अज्ञात है । लेकिन सामाजिक सगठन 14 अप्रैल को जयंती मनाते चले आ रहे हैं भारतीय समाज में पासी विभिन्न जातियों मे एक वीर और आत्मस्वाभिमान जाति है । यह जाति वीर और लड़ाकू जाति के रूप में भी जानी जाती थी. इसी वातावरण में उदा देवी का पालन-पोषण हुआ. जिसे इतिहास की रचना करनी होती है, उसमें कार्यकलाप औरों से न चाहते हुए भी अलग हो ही जाते हैं. जैसे-जैसे उदा बड़ी होती गई, वैसे-वैसे वह अपने हम उम्रों का नेतृत्व करने लगी. सही बात कहने में तो उदा पलभर की भी देर नहीं करती थी. अपनी टोली की रक्षा के लिए तो वह खुद की भी परवाह नहीं करती थी. खेल-खेल में ही तीर चलाना, बिजली की तेजी से भागना उदा के लिए सामान्य बात थी. 17 साल की कच्ची उम्र मे...

उत्तर प्रदेश की 17 उपजातियां किस आधार पर अनुसूचित जाति का दर्जा मांग रही थी

साथियों जब 17 उपजातियां अपने एक समान कुल या वंश वा समान पेसे वाली मूल जाति से जुड़ने वा अनुसूचित जाति में आने के लिए आवाज़ उठा रही थी तब  साथियों लगभग सभी जातियों ने सरकार को अपने अपने जातिय संगठन के लैटर पैड के माध्यम से अवगत कराया था  दोस्तो यह 17 उपजातियां किस आधार पर अनुसूचित जाति में आने के लिए आवाज़ उठा रही थी तो साथियों संजय निषाद जी ने अपने लैटर पैड के माध्यम से बताया था भारत के संविधान का अनुच्छेद 341  दोस्तो भारत के संविधान का अनुच्छेद 341 के खंड 1 के बारे में  भी जान लेते है  आर्टिकल 341 कहता है यदि कोई जाति अनुसूचित जाति में है  और उस क्षेत्र में उससे समंधित कोई जाति या उपजाति  है जिसका मूल सिद्धांत या पेसा उसकी मूल जाति से समंधित है या उसकी उपजाति हो उसे भी अनुसूचित जाति का ही समझा जायेगा यह आदेश है संविधान के अनुच्छेद 341 का इसी अनुच्छेद 341 के कारण वह सभी जातियां अपने अपने स्थार पर सरकार से अपनी मूल जाति से जुड़ने के लिए अनुसूचित जाति में आने के लिए लड़ रही थी लेकिन सरकार इनकी बातों पर ध्यान नहीं देती है  फिर यही 17 उपजातियां एक साथ...

राजा छत्रसाल का इतिहास? पासी जाति के राजा कौन थे? छत्रसाल कौन सी जाति के थे?

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साथियों इतिहास में छत्रसाल नाम के दो राजाओ का उल्लेख मिलता है। ______________________________ एक छत्रसाल बुंदेलखंड के । सन 1675-1731 रहे है  यह राजा औरंगजेब , छत्रपति शिवाजी के सम कालीन थे और _______________________________ दूसरे छत्रसाल नाम के राजा सन 1325 -1342 ईo में जौराली (जरवल)बहराइच के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार था यह गयासुदिन के समकालीन थे   _______________________________ मैं जिस राजा की बात कर रहा हूं वह है  जौराली (जरवल)बहराइच के पासी राजा छत्रसाल  ________________________________ महाराजा छत्रसाल पासी का शासन  जौराली (जरवल)बहराइच में 1325 से 1342 ई० तक रहा इन सत्रह सालो में महाराजा छत्रसाल पासी ने कई गढ़ी वा नगरो का निर्माण कराया ------------------------------------------------ राजा छत्रसाल ने जरौली( जरवल) को अपनी राजधानी बनाया यह कस्बा लखनऊ -बहराइच मार्ग पर लखनऊ से 85 किलो मीटर दूर तथा बहराइच से 47 किलोमीटर दुरी पर स्थित था सम्पूर्ण कस्बे की लंबाई 4 किलोमीटर तथा चौड़ाई 2 किलोमीटर है अभी भी जरवल में पासी राजा छत्रसाल के अनेक ...

*अवध उन्नाव क्षेत्र के भरपासियो का वर्चस्व और उनका गौरव पूर्ण इतिहास*

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पासी समाज के इतिहास को निरंतर  सरकार वा इतिहासकारो द्वारा छुपाया गया पासियो का इतिहास भी अगर कहीं लिखा हुआ है तो वह सिर्फ राजपूतों के इतिहास को उजागर करने के उद्देश्य से लिखा गया जो हमलावर राजपूत थे उन्हे नायक के रूप में दर्शाया गया है और स्थानीय निवासी पासी जाति को लुटेरा डाकू कहकर सम्बोधित किया गया है यह निंदनीय है (Distic gazetteer ) के अनुसार The family of Rampur - Bichauli or Nandauli belongs to the Bais clan and is said to have been founded by one Dudu Rai of Mainpuri , who , when passing through the pargana at the head of a bridal party , on his way to Itaunja , some seven hundred years ago , was attacked and robbed by the Bhars . He returned with an armed force and defeated the Bhar (Pasi ) *रामपुर-बछौली और नंदौली* का राजपूतों का परिवार बैस कबीले से संबंधित है और कहा जाता है कि इस क्षेत्र में बैंस राजपूतों की स्थापना मैनपुरी के दूदू राय ने की थी,जो एक दुल्हन की डोली लेकर अपने सैनिकों के साथ मुखिया के रूप में परगना से गुजरते समय इटौंजा जा रहे थे, लगभग सात सौ साल ...