राजभर जाति का पेसा? राजभर और राजपूत में सम्बंध। भर जाति कौन है पासी जाति का इतिहास

इतिहास लेखक : राम दयाल वर्मा जी से समझिए कि भर और राजभर व पासी जाति क्या हैं ? इन्हें कैसे वर्गीकृत किया गया हैं ? 

भर और राजभर में अंतर --
इस विषय पर हम पहले ही प्रकाश डाल चुके हैं अगर नये अंतरों के साथ कुछ पुराने अंतरों पर दृष्टिपात पुनः पड़ जाये तो वह स्वाभाविक और स्पष्टता लाने का ही मात्र माध्यम माने,  पुनरावृत्ति दोष है पर क्षम्य है साहित्यिक अवधारणा से यह भर और राजभर का अंतर विविध पुस्तकों  के अनुशीलन के माध्यम से रख रहा हू , विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत ,आप लोग देखें - 

नस्ल भेद :  
भर लोग द्रविड़ यानी नाग नस्ल के मनुष्य का जातीय समूह हैं,इनकी मध्यम कद काठी है और अधिकतर श्यामल त्वचा वाला समूह है।

राजभर
यह जाति आर्य नस्ल की जाति है, रंग साफ और कद लंबा तथा छरहरा  होता है यह असल भेद दोनों भर और राजभर  को नस्ल के हिसाब से प्रथक प्रथक निर्णीत करता है।  दोनों एक नहीं है नस्ल के अनुसार और राज्यों की सूची के मुताबिक भी - 

गोत्र और उत्पत्ति
भर लोग भारशिव नागों के वंशज हैं और इनका गोत्र पंच करपटी है महाभरत के अनुसार क्यों कि ये तक्षक कुल के नागों का गोत्र है जिसका अर्थ त्याग होता है।कश्यप गोत्र तो सब अविज्ञात जातियों का बतलाकर विप्र वाचक झमेलें से बच निकल जाता है जो सही नहीं है।

यह विशाल यदु कुल की चार में से,प्रमुख शाखा आंध्रक तक्षक कुल सम्भूत हैं।भार्गव काअर्थ शिव भी होता और भृगु का वंशज भी।
राजभर,यह लोग अपने को भरद्वाज लिखते हैं जो गोत्र वशिष्ठ से सूचित है,उपनाम ही भरद्वाज लिखते पाये जाते हैं। यह भरद्वाज, ममता व वशिष्ठ के नाजायज औलाद है,ममता वशिष्ठ के छोटे भाई वितथ्य की पत्नी थी । 

रहन सहन और भोजन : 
भर लोग साधारण वस्त्र धारण करने बाले,भोजन में मांसाहार , विशेष कर जंगली सुअरों का मांस खाने वाले पुष्ट शरीर के बतलाए गये है जो धनुष बाण रखने वालों के लिए ,युद्ध प्रियता के लिए आवश्यक है। कभी कुछ भरों ने सुअर पालन भी किया,जो भोजन और शत्रु रक्षात्मक उपाय ही माना जायेगा। राजभरों ने सुअर का मांस खुलेआम कम खाया,पालन के तो उदाहरण मिलते हैं पर खुलेआम नहीं ।इनको युद्ध की आवश्यकता नहीं पड़ी, शारीरिक पुष्टता इनके लिए कोई माने नहीं रखती। 

भोजन की शुद्धता
 भारतवर्ष में मुस्लिम धर्म से श्रेष्ठता का माप दण्ड बनी। नही तो बुद्ध ने भी सूकर मांस खाया था महा राणा प्रताप और उनके भाई शक्ति सिंह का मन मुटाव आखेट वराह पर ही हुआ था विस्वामित्र ने कुत्ते का मांस खाया था आर्यों के गोमांस भक्षण गोमेध के वेदों में दृष्टांत भरे पड़े हैं,वराह यानी सुअर गुर्जर प्रतिहाऱों का आदिवराह सिक्का है,  दक्षिणी संगम वंश भी सुअर का ध्वज चित्र अंकन रखते थे। श्री वराह वेंकट गिरि महामहिम राष्ट्रपति व यूपी के राज्यपाल रह चुके हैं। वराह अवतार तो सबने सुना पढ़ा है।

 अगर सुरक्षा और युद्ध कला में पासी ने सुअर का समाजोन्मुख प्रयोग किया तो यह जाति भारतीय संस्कृति की पोषक ही हुई, नाकि, स्वार्थ परतारत भीरुता पुष्ट तथा न कि मुस्लिम परस्त अभारतीय।

 तभी तो नागर जी कहते हैं कि " न जाने ये भर या भारशिव कहां गायब हो गये जिनका इस उत्तर भारत भूमि पर भारी ऋण चढ़ा हुआ है।गदर के फूल, उपन्यास में। हरदोई, शाहजहांपुर उन्नाव सब जगह पासी सुअर नहीं पालते, बल्कि जमींदार आज भी हैं।पुष्टांग के लिए क्या कद्दू खायें, या भिन्डी आलू " 

सम्बन्धों का स्वरुप : 
भर लोंग दृविण समूह से प्यार करते थे जो पूरे भारत में फैले हुए है ,चेर ,कोल,आरख खंगार अहिर गड़रिया भील आदिवासी सबसे मिले जुले थे,आज हम भर पासी है तभी तो कहा जाता है कि " अहिर गड़रिया पासी ये तीनों सत्यानाशी। उनका लिखित झूठ जिसे वे सत्य कहते हैं आर्यगण लोग । उसको ये नहीं मानते हैं ये पासी गडरिया और अहिर ही हैं । राजभर राजपूतों की सबसे निचली जाति है जो अपनी विक्रीत पुत्री राजपूतों को देते थे।यानी बेचते थे ।

हमारे पेशे : 
हम भर लोग और आज के पासी ग्रामीण पुलिस, चौकीदार और ताड़ी व्यवसाय वाले है,राजभर के व्यवसाय स्पष्ट नहीं हैं  कभी राजभर भारवाहक कभी डोली उठाने नाव संचालित करने वाले बिंद- निषाद, जलवंशी ,पूरबी भर,राजभर,भर पटवा बियार,झनकहा,भरपतिवा,भारत ,गौड़ आदि कहे गये 153 उप जातियों का समूह है।

राजपूतों का प्रकरण
पासी जो पूर्व का भर है मुसलमान और राजपूतों के द्वारा अपने राज्य या किलो से बेदख़ल किया गया , भर पासी आरखों का एक साथ सामंजस्य मिलता है गजेटियर आदि में,पर राजभरों का नही मिलता है ,इनका राजपूतों और राजभरों का सम्बन्ध है। रिस्तेदारी भी।

क्षेत्र और सीमा : 
भर सर्वत्र विद्यमान हैं पर ये सिर्फ़ पूर्वांचल के पांच जिलों में,गोरख पुर, बस्ती,आजम गढ़, देवरिया और वनारस में ही निवास करते हैं,अब रोजी रोटी हेतु बिखर गये है।

उच्चता और संस्कृति
भर उच्च संस्कृति वाली शासक जाति है,राजभर नाम का कोई राजा भारतवर्ष में नहीं हुवा,हुये हैं तो भर पासी ही । राजपासी जैसा मिलता जुलता राजभर नाम  सिर्फ़ भ्रम मूलक ही नहीं गुमराह करने वाला ही एक अकेला नाम नही है और भी देखें, जादव - जाटव, 
खत्री - क्षत्री,
अहिर - अहिरवार,
जायसवाल - जय सवार,
जाट - जाटव,
 दुसाध - दोसाध, 
रोहिदास - रोहिताश्व 
धनगर - धंगर ,
चौहान- चौह्वान,
माली - श्रीमाली,
कोरी - कोइरी,
आदि जातियुग्म एक दूसरे से रक्त और नस्ल में आकाश पाताल का अंतर रखते हैं।

 अंत में,इस लेख का लिखने का उपयोग और उद्देश्य सम्बंध को सही ढंग से परिभाषित करके एक दूसरे की जाति को नीचा और ऊंचा दिखाना नहीं है जो राजभर पासी को इंगित कर हेय और निम्न दिखाने की चेष्टा वीडियों व लेखों द्वारा करते रहते हैं और दोनों जातियों, पासी और राजभर में दूरी व दुर्भावना पैदा कर रहे हैं, उनको करारा जवाब समझें। 

भर पासी ,गाड़ निगलेटिंग और कास्ट डिसरिगारडिंग ,जाति है व आर्य परिधि से बाहर नाग नस्लीय हैं। हम न किसी को ऊच समझते हैं न नीच, कल्याणमय भारशिव है नव नागवंशी भरपासी । भर ,पासी का दूसरा नाम है ब्लंट ने सही कहा है।गलती सुधार लें।
लेखक: रामदयाल वर्मा जी


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