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पासी जाति के उपनाम । पासी जाति की उपजाति।

पासी जाति के प्रमुख उप नाम,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,, भारत वर्ष के धर्माधारित और वर्णाधिरित समाज में जातियों का जमघट   विदेशी विद्वानों के लिए  एक अलग ही अजूबा बना रहा,फिर हर जाति ने अपनी कम से सात उप जातियां भी खोज निकाली। अब उनके उप नाम, से जाति पहचान करना और भी कठिन हो गया है क्योंकि एक उप नाम कयी जातियों में सार्वभौमिक भी है जैसे सिंह  ,वर्मा, चौधरी रावत आदि आदि विविधता मूलक हैं।उप नाम चाभी के गुच्छे के समान होता है जो जाति के ताले को सुरक्षा देकर  सुगमता से खोल सकता है। यहां पर पासी जाति के कुछ उप नामों की संक्षिप्त चर्चा करने का यत्न करेगे ,,, राजवंशी,,,, यह उपजाति पासी जाति की प्राचीनता को प्रदर्शित करती है और भारशिव के साथ शासन कर्ता  के रुप में राजकीय श्रंखला से भी जुड़ी हुई है।शाह जहां पुर, सीतापुर हरदोई में अधिक  प्रचलित हैं। रावत,,,, यह उपजाति भी है उपनाम भी है,पासी समाज की यह उपाधि लखनऊ बाराबंकी उन्नाव में अधिक प्रचलित है इसका अर्थ सरदार होता है।अन्य जाति के लोग भी इस उप नाम का प्रयोग करते पाए जाते हैं।  भार्गव,,,,, यह सरनेम या उप नाम लख...

#वीरांगना_ऊदा_देवी_की_जयंती_और_उनका_इतिहास

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वीरांगना ऊदा देवी की जयंती को लेकर सामाजिक संगठनों के बीच खींचा तानी क्यूं  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  सच" क्या है सच्चाई तो ये है कि समाज के किसी भी बड़े राजनेता ने चाहे वो कांग्रेसी नेता धर्म वीर भारती हो। या फिर बहुजन विचारधारा को बढ़ावा देने वाले नेता राम समूझ पासी हो। या फिर आरके चौधरी हो। इन सभी बड़े नेताओं के द्वारा कभी भी वीरांगना ऊदादेवी पासी की जयंती 30 जून को मनाई ही नही गई नेताओ द्वारा विरागना ऊदादेवी की जयंती न मनाने तक तो ठीक था। लेकिन तमाम पासी जाति के सामाजिक इतिहासकार चाहे वो। इतिहासकार राजकुमार पासी हो। या फिर इतिहासकार आर डी रावत निर्मोही हो। या फिर इतिहासकार के०के० रावत हो। या फिर इतिहासकार रामदयाल वर्मा जी हो। या कोई अन्य इतिहासकार हो इन सभी लेखकों के द्वारा समाज के उनके छुपे हुए इतिहास को साक्ष्यों के आधार पर अपनी अपनी किताबों में उल्लेख कर समाज को सही इतिहास से प्रचित कराया गया लेकिन किसी भी लेखक ने किसी भी पुस्तक में वीरांगना ऊदादेवी पासी की जयंती 30 जून को नही लिखी गई इससे यह साबित होता है की वीरांगना ऊदा देवी क...

राजभर जाति का इतिहास। पासी जाति का इतिहास। भर पासी कौन सी जाति है

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भर ही पासी हैं।,,, लग भग सभी विद्वान जिन्होंने भारत में जातिओ पर लेखनी चलाई है या जनगणना आयुक्त में रह कर पुस्तकें लिखी हैं सभी ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है कि आधुनिक जाति पासी,ताड़ माली प्राचीन समय की भर या भारशिव जाति है।और जिसका अवध पर शासन रह चुका है। परंतु कुछ मंद बुद्धि और चालाक लोग इस जाति को आए दिन अपमानित करने से नहीं चूकते है,और पासियो की पसीने से उत्पत्ति की रट लगाते रहते हैं। जबकि अपनी जाति राजभर को  भरद्वाज कहीं भर पटवा  आदि बताते रहते हैं ऐसे एकांगी भद्दी सोच वाले वकील को जवाब देना लाजमी हो जाता है  वे यह भी जानें कि भरद्वाज वे थे जो बृहस्पति द्वारा अपनी छोटी भाभी उतथ्य की पत्नी ममता से बलात्कार स्वरूप पैदा हुए थे यह भरद्वाज नाम का अर्थ है। पासी ने कभी यह नहीं कहा कि वह परसुराम  से उत्पन्न है वह तो भृगु से अपनी पैदाइश जरुर कहा, क्यों कि भृगु वरुण सुत और पाश धर है।भरपटवा तो सभी जानते हैं बुन कर या कोरी,धागे से आभूषण गूंथने वाले कहे जाते हैं। चार्ल्स एल्फ्रेड ईलिएट ने क्रोनिकल्स ओफ उन्नाव नामक पुस्तक सन् 1862 मे लिखी थी जिसका अमुक एकांगी चंट वकील गलत ...

लखनऊ का इतिहास।लखनऊ का नाम कैसे पड़ा ।लखनऊ का राजा कौन था। लाखन पासी कौन था।

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आखिर 'नवाबों का शहर'  का नाम लखनऊ कैसे पड़ा ? जानिए लखनऊ नामकरण के पीछे की कहानी  ================================== लखनऊ बसने के किताबी उल्लेख -                                                    पहला किताबी उल्लेख अकबर के शासन काल में बिजनौर के शेखों का लखनऊ आकर बसने से शुरु होती है, उससे पहले यहां पासी समुदायों की घनी आबादी के साथ साथ ब्राह्मण और कायस्थों की टीले के इर्द गिर्द बसाहट दिखाईं देती हैं , इसके तह तक जाने में हमे 1896 के आसपास लिखी किताब " गुंजिश्ता लखनऊ " जिसे जाने माने लेखक साहित्यकार श्री अबुल हलीम शर्रर ने लिखा था जो नवाब वाजिद अली शाह के दरबारी भी थे और उनका परिवार उनके करीबी भी, उनसे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है, जिनकी किताब से उस समय के लखनऊ का खूबसूरत चित्रण किया गया है                                श्री अबुल हलीम शर्रर जी ने अपने किताब में लखनऊ के...

वीरांगना उदा देवी पासी जयंती को लेकर कन्फ्यूजन

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14 अप्रैल  वीरांगना उदा देवी पासी जयंती को लेकर हमारा पासी समाज दो विचारधाराओं में बट गया  एक विचार धारा वो रही जो बाबा साहेब की जयंती वाले दिन  सिर्फ अंबेडकर जयंती मनाना चाहते थे और विरागना उदा देवी की जयंती का विरोध करते रहे दूसरी विचारधारा ये रही कि बाबा साहेब की जयंती के कारण पासी महापुर्षो का सम्मान नहीं भूलेंगे इस लिए कुछ लोग विरागना उदादेवी और अंबेडकर की संयुक्त  जयंती मनाने की घोसडा कर दी  एक दूसरे का खूब विरोध हुआ उसके बाद भी  कई संगठनो द्वारा 14 अप्रैल को लखनऊ प्रतापगढ़ बाराबंकी प्रयागराज उन्नाव हरदोई में विरागना उदादेवी पासी जयंती मनाई गई जबकि विरागना उदा देवी के वंशजों द्वारा भी इसका विरोध किया गया उन्होंने  कहा जब 30 जून 1973 को  विरागना उदादेवी की मूर्ति स्थापित हुई थी तो स्थापना दिवस वाले दिन जयंती मनाई जाती है  फिर भी बाबा साहेब की जयंती को प्रभावित करने के लिए  विरागना उदादेवी जयंती क्यूं मनाई जा रही  वही दूसरी तरफ से कहा जाता है की इससे बाबा साहेब की जयंती परभावित नही होगी बल्कि अनुसूचित जाति में और एकता बढ़ेगी ...

महाराजा सातान पासी का इतिहास महाराजा बिजली पासी #पासी_जाती_का_इतिहास

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उन्नाव क्षेत्र के बड़े भू भाग पर राजपासियों का राज्य था।  उत्तर पश्चिम में राजपासियों की बाहुबली सत्ता स्थापित थी, और बांगरमऊ राजपसियो  का प्रमुख केंद्र था। इसी जिले में मशहूर पासी शासक महाराजा सातन  पासी का  राज्य 1150 से 1202 तक रहा राजा सातन पासी का किला सई नदी के पास था जिसके भग्नावशेष आज भी सातन य संचान कोट में मिलते है।                                                        महाराजा सातन पासी की सत्ता का केन्द्र बागरमऊ था जो उन्नाव जिले में पड़ता है,  सातन कोट  महाराजा सातन पासी के नाम से प्रसिद्ध था महाराजा सातन पासी तथा महाराजा बिजली पासी दोनों मित्र थे। जयचंद ने सोचा कि मुझे राज्य विस्तार करना है  और राज्य विस्तार के मार्ग में राजा सातन पासी और राजा बिजली पासी रोड़े हैं। अतः जयचंद ने सबसे पहले महाराजा सातन पासी  के किले सातन कोट पर आक्रमण कर दिया सातन पासी और जयचन्द के बीच घमासान युद्ध हुआ औ...

महाराजा सातान पासी का इतिहास महाराजा बिजली पासी #पासी_जाती_का_इतिहास

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उन्नाव क्षेत्र के बड़े भू भाग पर राजपासियों का राज्य था।  उत्तर पश्चिम में राजपासियों की बाहुबली सत्ता स्थापित थी, और बांगरमऊ राजपसियो  का प्रमुख केंद्र था। इसी जिले में मशहूर पासी शासक महाराजा सातन  पासी का  राज्य 1150 से 1196 तक रहा राजा सातन पासी का किला सई नदी के पास था जिसके भग्नावशेष आज भी सातन य संचान कोट में मिलते है।                                                        महाराजा सातन पासी की सत्ता का केन्द्र बागरमऊ था जो उन्नाव जिले में पड़ता है,  सातन कोट  महाराजा सातन पासी के नाम से प्रसिद्ध था महाराजा सातन पासी तथा महाराजा बिजली पासी दोनों मित्र थे। जयचंद ने सोचा कि मुझे राज्य विस्तार करना है  और राज्य विस्तार के मार्ग में राजा सातन पासी और राजा बिजली पासी रोड़े हैं। अतः जयचंद ने सबसे पहले महाराजा सातन पासी  के किले सातन कोट पर आक्रमण कर दिया सातन पासी और जयचन्द के बीच घमासान युद्ध हुआ औ...