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राजभर जाति का इतिहास। पासी जाति का इतिहास। भर पासी कौन सी जाति है

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भर ही पासी हैं।,,, लग भग सभी विद्वान जिन्होंने भारत में जातिओ पर लेखनी चलाई है या जनगणना आयुक्त में रह कर पुस्तकें लिखी हैं सभी ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है कि आधुनिक जाति पासी,ताड़ माली प्राचीन समय की भर या भारशिव जाति है।और जिसका अवध पर शासन रह चुका है। परंतु कुछ मंद बुद्धि और चालाक लोग इस जाति को आए दिन अपमानित करने से नहीं चूकते है,और पासियो की पसीने से उत्पत्ति की रट लगाते रहते हैं। जबकि अपनी जाति राजभर को  भरद्वाज कहीं भर पटवा  आदि बताते रहते हैं ऐसे एकांगी भद्दी सोच वाले वकील को जवाब देना लाजमी हो जाता है  वे यह भी जानें कि भरद्वाज वे थे जो बृहस्पति द्वारा अपनी छोटी भाभी उतथ्य की पत्नी ममता से बलात्कार स्वरूप पैदा हुए थे यह भरद्वाज नाम का अर्थ है। पासी ने कभी यह नहीं कहा कि वह परसुराम  से उत्पन्न है वह तो भृगु से अपनी पैदाइश जरुर कहा, क्यों कि भृगु वरुण सुत और पाश धर है।भरपटवा तो सभी जानते हैं बुन कर या कोरी,धागे से आभूषण गूंथने वाले कहे जाते हैं। चार्ल्स एल्फ्रेड ईलिएट ने क्रोनिकल्स ओफ उन्नाव नामक पुस्तक सन् 1862 मे लिखी थी जिसका अमुक एकांगी चंट वकील गलत ...

लखनऊ का इतिहास।लखनऊ का नाम कैसे पड़ा ।लखनऊ का राजा कौन था। लाखन पासी कौन था।

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आखिर 'नवाबों का शहर'  का नाम लखनऊ कैसे पड़ा ? जानिए लखनऊ नामकरण के पीछे की कहानी  ================================== लखनऊ बसने के किताबी उल्लेख -                                                    पहला किताबी उल्लेख अकबर के शासन काल में बिजनौर के शेखों का लखनऊ आकर बसने से शुरु होती है, उससे पहले यहां पासी समुदायों की घनी आबादी के साथ साथ ब्राह्मण और कायस्थों की टीले के इर्द गिर्द बसाहट दिखाईं देती हैं , इसके तह तक जाने में हमे 1896 के आसपास लिखी किताब " गुंजिश्ता लखनऊ " जिसे जाने माने लेखक साहित्यकार श्री अबुल हलीम शर्रर ने लिखा था जो नवाब वाजिद अली शाह के दरबारी भी थे और उनका परिवार उनके करीबी भी, उनसे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है, जिनकी किताब से उस समय के लखनऊ का खूबसूरत चित्रण किया गया है                                श्री अबुल हलीम शर्रर जी ने अपने किताब में लखनऊ के...

वीरांगना उदा देवी पासी जयंती को लेकर कन्फ्यूजन

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14 अप्रैल  वीरांगना उदा देवी पासी जयंती को लेकर हमारा पासी समाज दो विचारधाराओं में बट गया  एक विचार धारा वो रही जो बाबा साहेब की जयंती वाले दिन  सिर्फ अंबेडकर जयंती मनाना चाहते थे और विरागना उदा देवी की जयंती का विरोध करते रहे दूसरी विचारधारा ये रही कि बाबा साहेब की जयंती के कारण पासी महापुर्षो का सम्मान नहीं भूलेंगे इस लिए कुछ लोग विरागना उदादेवी और अंबेडकर की संयुक्त  जयंती मनाने की घोसडा कर दी  एक दूसरे का खूब विरोध हुआ उसके बाद भी  कई संगठनो द्वारा 14 अप्रैल को लखनऊ प्रतापगढ़ बाराबंकी प्रयागराज उन्नाव हरदोई में विरागना उदादेवी पासी जयंती मनाई गई जबकि विरागना उदा देवी के वंशजों द्वारा भी इसका विरोध किया गया उन्होंने  कहा जब 30 जून 1973 को  विरागना उदादेवी की मूर्ति स्थापित हुई थी तो स्थापना दिवस वाले दिन जयंती मनाई जाती है  फिर भी बाबा साहेब की जयंती को प्रभावित करने के लिए  विरागना उदादेवी जयंती क्यूं मनाई जा रही  वही दूसरी तरफ से कहा जाता है की इससे बाबा साहेब की जयंती परभावित नही होगी बल्कि अनुसूचित जाति में और एकता बढ़ेगी ...

महाराजा सातान पासी का इतिहास महाराजा बिजली पासी #पासी_जाती_का_इतिहास

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उन्नाव क्षेत्र के बड़े भू भाग पर राजपासियों का राज्य था।  उत्तर पश्चिम में राजपासियों की बाहुबली सत्ता स्थापित थी, और बांगरमऊ राजपसियो  का प्रमुख केंद्र था। इसी जिले में मशहूर पासी शासक महाराजा सातन  पासी का  राज्य 1150 से 1202 तक रहा राजा सातन पासी का किला सई नदी के पास था जिसके भग्नावशेष आज भी सातन य संचान कोट में मिलते है।                                                        महाराजा सातन पासी की सत्ता का केन्द्र बागरमऊ था जो उन्नाव जिले में पड़ता है,  सातन कोट  महाराजा सातन पासी के नाम से प्रसिद्ध था महाराजा सातन पासी तथा महाराजा बिजली पासी दोनों मित्र थे। जयचंद ने सोचा कि मुझे राज्य विस्तार करना है  और राज्य विस्तार के मार्ग में राजा सातन पासी और राजा बिजली पासी रोड़े हैं। अतः जयचंद ने सबसे पहले महाराजा सातन पासी  के किले सातन कोट पर आक्रमण कर दिया सातन पासी और जयचन्द के बीच घमासान युद्ध हुआ औ...

महाराजा सातान पासी का इतिहास महाराजा बिजली पासी #पासी_जाती_का_इतिहास

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उन्नाव क्षेत्र के बड़े भू भाग पर राजपासियों का राज्य था।  उत्तर पश्चिम में राजपासियों की बाहुबली सत्ता स्थापित थी, और बांगरमऊ राजपसियो  का प्रमुख केंद्र था। इसी जिले में मशहूर पासी शासक महाराजा सातन  पासी का  राज्य 1150 से 1196 तक रहा राजा सातन पासी का किला सई नदी के पास था जिसके भग्नावशेष आज भी सातन य संचान कोट में मिलते है।                                                        महाराजा सातन पासी की सत्ता का केन्द्र बागरमऊ था जो उन्नाव जिले में पड़ता है,  सातन कोट  महाराजा सातन पासी के नाम से प्रसिद्ध था महाराजा सातन पासी तथा महाराजा बिजली पासी दोनों मित्र थे। जयचंद ने सोचा कि मुझे राज्य विस्तार करना है  और राज्य विस्तार के मार्ग में राजा सातन पासी और राजा बिजली पासी रोड़े हैं। अतः जयचंद ने सबसे पहले महाराजा सातन पासी  के किले सातन कोट पर आक्रमण कर दिया सातन पासी और जयचन्द के बीच घमासान युद्ध हुआ औ...

#खैराबाद का #इतिहास।#सीतापुर का इतिहास। #पासी जाति का इतिहास। #राजा खैरा #पासी का इतिहास।

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Khairabad History- नाम कैसे पड़ा....? ✅ ============================ ब्रिटिश विद्वान्  Eliot, Chronicles unno.24         इलियट साहब पासियो के बारे में कहते है -                                                                 अवध के बड़े भू भाग सहित बड़े हिस्सों पर  8वीं  से 12 वि सदी तक पासी जाति ने शासन चलाया, साथ ही इलियट साब  पासी जाति के अन्तिम शासक के रुप में राजा सातन पासी को मानते हैं वे कहते है -                                        " अवध के दौरान पासियों की परंपरा है कि वे देश के स्वामी थे और उनके राजाओं ने खीरी जिलों में संडीला, धौरहरा, मितौली और रामकोट में शासन किया था। हरदोई और उन्नाव रामकोट, जहां उन्नाव में बांगरमऊ शहर अब खड़ा है, उनके प्रमुख गढ़ों में से एक माना जाता है। ...

बहरेलिया डीह पर कभी था पासी शासन

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बहरेलिया डीह  का इत्तिहास  लोकल कीव दंती व अन्य लेखको  के अनुसार  बहरेलिया डीह का इत्तिहास बहुत महत्व पूर्ण है लगभग 600 वर्ष पहले राजपूतों के आने से पहले यहां पासी जाति का शासन था अकबर ने भी पहले के शासकों के तरह पासियो का विनाश जारी रखा , पठानों ने इस जगह को पासियो को परास्त करके छीन लिया आगे चलकर पठानों का सरगना जिसका नाम अवर खान था उसने अकबर से विद्रोह कर  और कर  देना बंद कर दिया, उसके विरोध को दबाने के लिए अकबर ने एक राजपूत रिसालदार राजा बरम बली सिंह को नियुक्त किया जिसने पठानो को हरा दिया, आगे यही क्षेत्र अकबर ने राजा बरम बली सिंह को सौंप दिया , यह तालाब पठान शासक के द्वारा बनवाया गया था आज भी लोगो की स्मृति में इस ऊंचे डीह को पठान का तालाब कहते है ' स्थनीय किदवंती यह कहती है की राजपूतों ने स्थानीय पासियो को मिलाकर इस पठान शासक का वध किया , इस क्षेत्र में आज भी पासियो की आबादी ज्यादा है जो अतीत में  झांकने पर विवश करती है