जरायम एक्ट पेसा कानून (Criminal tribe act)
आज हम बात करेंगे कि अछूत दलित कौन है? और यह लोग दलित कैसे बन गए?
इसकी शुरुआत होती है अंग्रेजों की एक साजिश से।
जिसका नाम है, क्रिमिनल_ट्राइब्स_एक्ट 1871,
यदि मैं कहूं ,आपकी पूरी जाति को 80 साल मतलब 3 पीढ़ियों के लिए सामाजिक ढांचे से अलग कर दिया जाए। आपको बहिस्कृत कर दिया जाए तो आपका क्या होगा?
आप आज के दलित बन जाएंगे। अंग्रेजो ने यही किया ।
अंग्रेजों ने 1871 से 1952 तक 200 से अधिक जातियों के 4 करोङ से अधिक लोगों को अपराधी का ठप्पा लगा दिया। और उन्हें समाजिक ढांचे से विमुक्त कर दिया। ये कोई फिल्म की कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। ये उन्हीं जातियों के लोग है जो आज खुद को दलित कहते है। इन जातियों के पूरे समूह को अपराधी घोषित कर दिया गया। इन जातियों के लोग अंग्रेजी प्रशासन की आज्ञा के बिना अपने क्षेत्र से बाहर नही जा सकते थे इन्हें प्रशासन की नज़र में ही रहना पड़ता था। जिससे ये अन्य समाज से धीरे-धीरे अलग होते चले गए। 80 साल का वक़्त मतलब तीन पीढ़ी । जो किसी भी समाज की सभ्यता संस्क्रति और आर्थिक ढांचे को नष्ट करने के लिए काफी है। इसी *क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट* की वजह से इन 200 से अधिक जातियों के 4 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी और भुखमरी की तरफ बढ़ चले। ये वही जातियां थी जो कभी छोटी छोटी रियासतो और कबीलों के राजा व अधिकारी हुआ करते थे । ये वही लड़ाकू कौम है, जिन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजो की कमर तोड़ दी थी । हमें आज तक 1857 के विद्रोह को सिर्फ सेना का विद्रोह बताया गया लेकिन वास्तव में ये विद्रोह इन्ही जातियों का था।
1857 के विद्रोह को आगे बढ़ाने के लिए अनेक जातियों ने गोरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) करके अंग्रेजों को बहुत क्षति पहुंचाई थी। इस एक्ट में उन्ही जातियों को शामिल किया गया था।
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रामनारायण रावत, इतिहास के प्रोफेसर और भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक बहिष्कार के विशेषज्ञ बताते हैं, कि इस अधिनियम के तहत आपराधिक-जन्मजात जातियों में शुरू में गुर्जरों और राजपूतों के उप-कबीले शामिल थे, लेकिन 19 वीं शताब्दी के अंत तक इसमें, वाल्मीकि, केवट, मीना, डोम, निषाद ,पासी ,मल्लाह , खटिक आदि के साथ-साथ बहुत सी पहाड़ी व मैदानी जनजातियां भी शामिल कर दी ।
ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभिन्न हिस्सों में आपराधिक विद्रोही जातियों की एक सूची तैयार की, और जाति-जनगणना द्वारा इन जातियों में पंजीकृत सभी सदस्यों को उन क्षेत्रों के संदर्भ में प्रतिबंधित कर दिया गया, जहां वे जा सकते थे, जिन लोगों के साथ वे सामाजिक संबंध स्थापित कर सकते थे।
भारत के कुछ क्षेत्रों में पूरे जाति समूहों को जन्म से दोषी ठहराया गया, गिरफ्तार किया गया, बच्चों को उनके माता-पिता से अलग कर दिया गया, और दंडात्मक उपनिवेशों में रखा गया और बिना किसी सजा या उचित प्रक्रिया के संगरोध किया गया।
19 वीं सदी के मध्य से 20 वीं शताब्दी के मध्य तक लक्ष्यित जातियों के खिलाफ आपराधिक-जन्म-कानून लागू किया गया था, 1900 और 1930 के दशक के दौरान पश्चिम और दक्षिण भारत में आपराधिक जातियों की सूची का विस्तार किया गया था। सैकड़ों हिंदू समुदायों को आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत लाया गया था। 1931 तक, औपनिवेशिक सरकार ने अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में अधिनियम के तहत 237 आपराधिक जातियों को सूचीबद्ध किया।
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ध्यान दे इस अधिनियम 1871 के तहत बच्चो को भी जन्म आधारित अपराधी ठहराया गया। ये थी शुरुआत सम्रध्य भारत की कमर तोड़ने की कोसिस | भारत पर सैकड़ो हमले हुए लेकिन किसी भी हमले में भारत को ऐसी आर्थिक क्षति नही हुई। सन् 1740 में भारत की जीडीपी विश्व की जीडीपी की एक -तिहाई थी। लेकिन 19वी शताब्दी तक आते आते भारत भूखे नंगों का देश हो गया। और जीडीपी 0.04प्रतिशत पर आ गयी।। कैसे? इसका मुख्य कारण भी यही एक्ट था। जितनी भी महामारी भारत मे आयी सब इसी दौरान आयी क्यों? (अंग्रेजों ने हैजे, मलेरिया के संक्रमित लोगों को जानबूझकर इनके लोगों के मध्य छोड़ा )
जनगणना की शुरुआत भी इसी का हिस्सा थी। कि लोगो को कैसे विभाजित किया जाए?इस एक्ट ने भारत के 4 करोङ से अधिक लोगो को भुखमरी और अत्यंत ग़रीबी पर ला कर खड़ा कर दिया। और उनकी आने वाली नस्लो को भी जन्मजात अपराधी घोषित किया। और ये वही अपराधी जतिया है जिनके वंशज आज के दलित है।
जिन्हें इस एक्ट की वजह से शिक्षा और समाज से दूर होना पड़ा।
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जो आज ब्राह्मणवाद और मनुवाद को अपनी हालात का जिमेदार समझते है।उसका असली जिम्मेदार अंग्रेजों का 1871 का ये एक्ट है।
अंग्रेजो का षड्यंत देखिए।
इन्ही लोगों मे से अमबेडकर को चुना और इनका मसीहा बना कर पेश कर दिया और अम्बेडकर ने अपनी किसी भी किताब में इस एक्ट के बारे में कोई जिक्र नही करते। वो भी अंग्रेजो की स्क्रिप्ट पर चलते हुए उन ही का काम करते रहे, मैक्समूलर को कॉपी पेस्ट करते गये।
एवं अम्बेडकर इस क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के अंतर्गत आने वाली जातियों के वोट देने के अधिकार के भी खिलाफ थे। इसी कारण चमार व अन्य जातियों के लोगों ने अम्बेडकर को चुनाव हराया था और ब्राह्मणों की सहायता की थी।
जबकि 17 वी शताब्दी में भारत आए एक फ्रांसीसी लेखक टैवर्नियर जिसने पूरे भारत का भ्रमण किया। उसने अपनी किताब में भारत में व्याप्त कुप्रथाओं का जिक्र किया है परंतु कहीं भी उसने अछूत या दलित शब्द का प्रयोग नहीं किया है। उसने तो शूद्रों को पदाधि योद्धा कहा है, जो क्षत्रियों के साथ मिलकर शत्रु पक्ष से युद्ध करते हैं। एवं क्षत्रिय व शूद्र सैनिक योद्धा युद्ध में वीरगति प्राप्त करने को अपना सौभाग्य समझते हैं।
वो तो भला हो उस स्वतंत्रता सेनानी का जिन्होंने 8 वर्ष के कारावास की सजा भी काटी, पासी जाति के श्री मसुदिनिया पासी जी का।
जिन्होंने 1952 में भरी संसद में यह कहा कि भारत के 1947 में आजाद हो जाने के बाद व उसके 1950 में संविधान लागू हो जाने के 2 वर्ष के बाद भी यह अंग्रेजों का काला कानून क्यों चल रहा है ??
यदि अब यह कानून खत्म नहीं किया गया तो मैं यही संसद में सबके सामने आत्मदाह कर दूंगा। उनके ऐसे कड़े कदम से तत्कालीन सरकार ने तब यह काला कानून ( क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871) को खत्म किया।
श्री मसुदिनिया पासी जी को शत् शत् नमन।
आज के सभी लोगों को यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। और शेयर करना चाहिए
1952 के बाद मीणा समाज पूरे भारत में हर क्षेत्र में प्रगति की है.पासी अभी तक जरायम पेशा एक्ट का रोना क्यों रो रहा है.
जवाब देंहटाएंKyonki is act ne poori tarah. Se barbad kar diya tha
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