भारशिव वंश की उत्पत्ति कैसे हुई भारशिव वंश की जाती कौन सी है
नाग कुल के शासक नव नाग ने उत्तर भारत में गंगा तट पर कान्तिपुर विंध्याचल मिर्जापुर में धार्मिक अनुष्ठान में शिवलिंग को अपने कन्धे पर उठा लिया जिसके कारण भारशिव नाम से एक नया राजवंश उदय हुआ भारशिवो का साम्राज्य मालवा,ग्वालियर,बुंदेलखंड और पूर्वी पंजाब तक फैला था। और इन्ही भारशिवो ने कुषाणों के राज्य की नींव हिला दी
कुषाणों को भारत से भगाने वाले भारशिव राजा
1 नवनाग (भारशिव वन्स के जनक कहे जाते है )
140 ईo से 270 ईo तक
2 वीरसेन (भारशिव)170 ईoसे 210 ईo तक
3 भीम नाग (भारशिव)210 ईo से 250 ईo तक
4 देव नाग (भारशिव)311 ईo से 340 ईo तक
5 भवनाग (भारशिव )315 ईo से 340 ईo तक
आदि राजाओ ने अपने पराक्रम का बल दिखाया था
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लेकिन भारशिव राजाओं में सबसे प्रसिद्ध और सक्तशाली राजा वीरसेन था। कुषाण अपना राज्य विस्तार भारत में कर रहे थे तब कुषाणों के रस्ते का काटा भारशिव राजा वीर सेन था महाराजा वीरसेन भारशिव पासी कुषाणों को परास्त करके 10 अश्वमेध यज्ञों का सम्पादन किया था और अपने परम्परा को बढ़ाते हुए कंधे पर शिवलिंग धारण किया और अपने पराक्रम के बल पर भारशिवो ने राज सत्ता कायम कर लिया उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद ज़िले में एक शिलालेख मिला है, जिसमें इस प्रतापी राजा का उल्लेख है।
इस प्रतापी राजा के सिक्के भी प्राप्त हुए है
पद्मावती,
कान्तिपुरम, मथुरा ,विदिशा, भारशिव राजाओ की राजधानीया थी जो समय समय पर बदलती रही
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278 ई.के लगभग पाटलिपुत्र से भी कुषाणों का शासन समाप्त हुआ। इसका श्रेय विंध्यशक्ति को जाता है।
नोट : विंध्यशक्ति को लेकर लेखक खुद कन्फ्यूज है कई लेखक मानते है कि विंध्यसक्ति कोई राजा था जबकि कई लेखक अपनी लेखनी में लिखते है कि विंध्यसक्ति एक माहसंघ था
कुषाणों का विरोध करने के लिए भारशिवो द्वारा इस महासंघ की स्थापना की गयी थी जिसमे अनेक भारशिव नाग राजाओ ने भाग लिया था और उस महासंघ से जो शक्ति उतपन्न हुई उसका नाम विंध्यासक्ति दिया गया और इस विंध्यसक्ति का सेनापति ब्राह्मणों को बनाया गया
जिन्होंने भारशिवो नागों के साथ मिलकर कुषाणों से लड़ाइयां लड़ी जब सहसा कुषाण साम्राज्य परास्त हो गया तब भारशिव नरेशो ने 10 अश्व मेघ यज्ञ किया ये यज्ञ कासी के नगवा नामक स्थान पर सम्पन्न हुए थे और भारशिवो के शव प्रोहित ब्राह्मण ही थे और ब्राह्मणों ने ही नाग नरेश भारशिवो का राज्याभिषेक गंगा के पवित्र जल से किया था
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(पुस्तक भारत की जाती प्रथा )के पेज 148 पर कह गया है कि भारशिवो ने एक महासंघ की स्थापना की थी जिसमे अनेक भारशिव नाग राजाओ ने भाग लिया था लेकिन उस महासंघ का नाम नही बताया गया
पुस्तक (भारशिव राजवन्स गौरव) के पेज नम्बर 54 पर
लेखक (रामदयाल वर्मा )इसकी पुष्टि करते है
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अब मैं भी कह सकता हु की उस महासंघ का नाम विंध्यसक्ति ही था जो
भारशिव राजाओं की प्रेरणा से ही विंध्यशक्ति ने पाटलिपुत्र से मुरुण्ड शासकों का उच्छेद कर उसे कान्तिपुर के साम्राज्य के अन्तर्गत कर लिया था। मगध को जीत लेने के बाद भारशिवों ने और अधिक पूर्व की ओर भी अपनी शक्ति का विस्तार किया। अंग देश की राजधानी चम्पा भी बाद में उनकी अधीनता में आ गयी। वायु पुराण के अनुसार नाग राजाओं ने चम्पापुरी पर भी राज्य किया था।
पर मगध और चम्पा के भारशिव लोग देर तक पाटलिपुत्र में शासन नहीं कर सके। जिस प्रकार हरियाणा - पंजाब में यौधेय, आर्जुनायन आदि गण स्वतंत्र हो गये थे, वैसे ही इस काल की अव्यवस्था से लाभ उठाकर उत्तरी बिहार में लिच्छवि गण ने फिर से अपनी स्वतंत्रत सत्ता स्थापित कर ली थी।
भारशिव ( पासी )नरेशो ने नीमसार में जन जागरण यज्ञ भी किया और कुषाणों के बौद्ध धर्म को भारत में पासियों ने नकार दिया हिन्दू (शैवधर्म )का विस्तार किया
पुस्तक (भारशिव राजवन्स गौरव ) के पेज 45 पर रामदयाल वर्मा जी लिखते है
जब कोई राजवन्स किसी से हार जाता है तो उसकी जाती उसका धर्म भी हार जाता है कुषाणों के सत्ता में आने से बौद्ध धर्म भारत में पैर पसारने लगा लेकिन भारशिव (पासी) नरेश राजा वीरसेन के नेतृत्व में कुषाणों को परास्त करके चीन के सीमा तक खदेड़ दिया और बौद्ध धर्म हिन्दू (शैवधर्म) से हार गया हिन्दू शैव धर्म जीत गया और इस तरह भारत में बौद्ध धर्म का विस्तार रुक गया
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भारशिव राजा मित्र नंदी अपनी मुद्राएँ चलाई उन सिक्कों पर अपना चिन्ह ताड अंकित किया
जो ताड का पेड़ भारशिव राजाओ का झंडे का चिन्ह था ताड आज भी पासियों से सबंधित है बेवसाय के रूप में
और उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति की लिस्ट में पासी ताडमाली के नाम से अंकित है और पद्मावती जो भारशिव राजाओ की राजधानी थी उनकी दीवारों पर ताड के पेड़ बने हुए थे तो इस तरह भारशिव वन्स पासियों से समन्धित है इसके प्रमाण मिलते रहते है
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पासी जाती के महिलाओं द्वारा विवाह के उत्सव पर सदियों से यह गीत गाया जाता रहा है
घर में ही गंगा घर में ही जमुना
घर में ही पंच पराग (प्रयाग)
जल कम्पै जल लहरि कम्पै
कम्पै कुषाण के गात
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इस गाने का व्यावहारिक अर्थ है
गंगा और जमुना पर हमारा अधिकार है। जैसे घर पर मनुष्य का पूर्ण अधिकार होता है
हमारी जाती भारशिव का नाम सुनते ही कुषाणों के सरीर की रूह कांप उठती थी जैसे जल और जल की लहरे कांपती है
यह गीत
पुस्तक :भारशिव राजवन्स गौरव के पेज 30 से लिया है
लेखक :रामदयाल वर्मा
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लेखक : नवल वियोगी
प्रफेसर :ऍम अनवर अन्सारी पुस्तक : (उत्तरा पथ के नाग शासक तथा शिल्पकार आंदोलन का इतिहास)
पेज 86 पर लिखते है
हम जानते है कि पद्मावती के भारशिव जो मूल रूप से तक्षशिला के टाक राज परिवार के संतान थे जब उनसे सब कुछ छीन गया तो उनकी एक साखा पासी बन गयी दूसरी भर बन गयी
लेखक :रामदयाल वर्मा
पुस्तक :(भारशिव राजवन्स गौरव) के पेज 39 पर इसकी पुष्टि करते है
लेखक :(डाक्टर योगेश प्रवीन)
पुस्तक: (लखनऊ के मोहल्ले और उनकी सान)
पेज 11 पर लिखते है कि हिमालय के तराई से आकर लखनऊ पर भारशिव वन्स के भर और राजपसियो ने अधिकार कर लिया
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