पासी_का_पिछड़ने_का_कारण_क्या_है

..... वर्तमान में संवैधानिक रूप से पासी समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल कर एक शासक वर्ग की रही-सही कसर बिल्कुल खत्म कर दी गई है।  पासी समाज की प्राचीनतम पृष्ठभूमि से जैसा कि हम आप परिचित हो चुके हैं कि यह समाज राजपूतों व अन्य शासक जातियों की ही तरह मध्य भारत व उत्तर भारत की एक प्रमुख शासक जाति रही है।  जिसका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ ऐतिहासिक किताबों में भी मिलता है। 
 सत्ता के शिखर पर सिंहासनारूढ़ होने के बाद इनका पतन कैसे हुआ....? इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम पाते हैं कि यह अवनति की प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण हुई है। 
      प्रथम चरण में हम देखते हैं कि भारत की इस प्राचीनतम शासक जाति का शुरुआती पतन विदेशी आक्रमणकारियों से हुए युद्धों में मिली पराजय से इनकी शक्ति आंशिक रूप से प्रभावित हुई थी.... विदेशी आक्रमणकारियों में शको, कुषाणों व इस्लामी तत्वों के नाम लिये जा सकता है।  वाह्य आक्रमणकारियों के अलावा कई अन्य भारतीय राजपूत शक्तियां थीं जिसे भारशिव नागवंशी राजाओं की प्रतिस्पर्धा जारी रही जिसमें वे स्वयं को स्थापित करने में असफल रहे और पतनोन्मुख हुए।
     द्वितीय चरण में  अपनी सत्ता खो देने के बाद भारशिव नागवंशी राजाओं ने जब पुनः अपनी सत्ता प्राप्त करने का प्रयास न कर के यायावरी जीवन को चुना तब ही इनका वर्तमान जातीय नाम 'पासी' पड़ा। इस यायावरी जीवन यात्रा में साहसी भारशिव नागवंशी शासकों ने जीवन-यापन के लिए अपनी सैनिक वृत्ति के स्वभावत: अपराध/लूटमार को जीविका का साधन बनाया, जिसके चलते बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर जरायमपेशा एक्ट लगा दिया जिसके अंतर्गत उनको अपनी पूरी स्थिति से समय-समय पर प्रशासन को अवगत कराते रहना पड़ता था तथा उनके निवास स्थल के आस-पास किसी भी गतिविधि के लिए उन्हें ही कसूरवार ठहराया जाता था। इस तरह से शासन-प्रशासन ने पूरी तरह से उनकी गतिविधियों को सीमित और निगरानी के दायरे में ला कर एक तरह से उन्हें गुलामी के कटघरे में डाल दिया जिससे उनकी स्थिति एकदम कमजोर और दयनीय होती चली गई।  इसी दौर में भीमराव आंबेडकर ने भी अंग्रेजी हुकूमत का ही पक्ष लिया और  किसी भी प्रकार से राहत नहीं दिलवाई, यही नहीं आंबेडकर ने जराएमपेशा एक्ट में निरुद्ध जातियों से प्रर्याप्त दूरी बनाए रखी।  ऐसा भी कहा जाता है कि आंबेडकर जी ने जराएम पेशा जातियों को वयस्क मताधिकार से भी वंचित रखने की सलाह अंग्रेजी हुकूमत को दी थी।  इस तरह दूसरे चरण में भी उनकी आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक स्थिति में भी लगातार गिरावट आई।
     तीसरे चरण में यदि देखा जाए तो यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का वह समय था जब पासी समुदाय की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनैतिक स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी थी कि उसे  'अनुसूचित जाति' की लिस्ट में शामिल कर लिया गया। कभी शासक वर्ग में शामिल रह चुका भारशिव नागवंशी समाज अपने सबसे बुरे दौर में आ चुका था उसे अब अपना प्राचीनतम गौरवशाली इतिहास बिल्कुल भी याद नहीं रहा, उसने अनुसूचित जाति वाली निम्नतम स्थिति को बिना किसी तर्क के चुपचाप स्वीकार कर लिया। उसके पास इसके सिवा और कोई मार्ग भी नहीं था क्योंकि तत्समय वह शिक्षित जागरूक नेतृत्व के अभाव के द्वारा से गुजर रहा था।  इसी तीसरे चरण में ही एक ऐसा भी दौर कांशीराम द्वारा लाया गया था जिसे आप 'बहुजनीकरण'  की अवधारणा का नाम दे सकते हैं। इसके अंतर्गत भारशिव नागवंशी राजाओं के वंशजों को तरह-तरह की उत्पीड़न की मनगढ़ंत कहानियां सुनायी गयी जिसे अशिक्षित इस समाज के लोगों ने अक्षरशः मान लिया और एक ऐसे वर्ग को अपना शत्रु घोषित कर दिया जिससे उसका कभी रोटी-बेटी जैसा समानता का रिश्ता था। आपको तो यह जान कर आश्चर्य होगा कि जो हांडी-झाड़ू की कहानी किसी और दलित जातियों के साथ कभी घटित रही होगी उसे पासी समुदाय के लोगों के साथ भी जोड़ दिया गया जिसे अशिक्षित और मंदबुद्धि हो चुके पासी समुदाय ने मान कर अपना आत्मबल का कबाड़ा कर लिया।कांशीराम के इस मनगढ़ंत झूठे फरेब में फंस कर पासी समुदाय ने अपना सब कुछ खो दिया और वह पूरी तरह से अपने को दलित मान लिया और उस आंबेडकर का जाने-अनजाने गुणगान भी करने लगा जिसने कभी उसे बड़ी बेरुखी से अंग्रेजी हुकूमत के सामने उसे उसके अधिकारों से वंचित रखने की सलाह दी थी। इस तथ्य से अनजान आज भी बहुत से पासी कभी कभी इतनी भावुकता भरी बातें करते हैं कि वे अपने पूर्वजों के सामने सिर झुका देंगे तो वे उस आंबेडकर को मरने के बाद जब उसके पास जाएंगे तो क्या जवाब देंगे.....जैसी इतनी मूर्खतापूर्ण बातों से तो मुझे उन बेचारों की बुद्धि पर बहुत तरस आता है कि इन्हें क्या कहा जाए...!  पासी समुदाय को जहां एक ओर कांशीराम ने उनका इतिहास बताने के बजाय उन्हें पूरी तरह से दलित बना दिया, वहीं दूसरी ओर पासी समाज के तत्समय के नव शिक्षित युवा जो खुद को बड़ा पढ़ा-लिखा समझते थे वे भी कांशीराम के पीछे-पीछे आंख बंद कर हो लिए और उनकी आंख तब खुली जब कांशीराम ने आंखें बंद कर ली। लेकिन अब क्या हो सकता था जब चिड़िया ने सारा खेत ही चुग लिया था.....इस तरह इस देश की एक प्राचीनतम शासक जाति  भारशिव नागवंशी आगे चलकर बाद में पासी नाम से दलित की स्थिति में आ गयी जिसे आज भी अपनी स्थिति मजबूत कर सम्मानित जीवन-यापन का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है ....साथ ही पुराने गौरवशाली इतिहास को याद करने की बात कौन करे.... यहां तो खुद को दलित समझ कर दूसरों को गालियां देने से ही इस समाज के अधकचरे ज्ञानियों को फुर्सत नहीं है....! लेखक सतीश पासी

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